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घर-घर पधारे गजानन, जानें क्यों इतनी ख़ास है गणेश चतुर्थी

New Delhi, आकाश शेवड़े | Updated : 05 September 2016, 02:45 PM
मुंबई में लालबाग के राजा की पहली झलक  (Source- Getty Images)
मुंबई में लालबाग के राजा की पहली झलक (Source- Getty Images)

गणेश चतुर्थी बुद्धि और ज्ञान के देवता भगवान गणेश की पूजा का सबसे बड़ा दिन माना जाता है। गणेशोत्सव भारत के सबसे बड़े हिन्दू पर्वों में से एक है। गणेशोत्सव देश भर में मनाया जाता है लेकिन महाराष्ट्र में इसकी धूम कुछ ज्यादा ही होती है। इस त्योहार में हिन्दू धर्म के ईष्ट देवता गणेश की विशेष पूजा की जाती है। 11 दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव को सभी धर्मों के लोग एक त्योहार की तरह मनाते हैं।

 

कब और क्यों मनाते हैं गणेशोत्सव-

हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक़ भाद्रपद महीने के चतुर्थी को इसे मनाया जाता है। नारद पुराण के अनुसार भगवान शिव ने देवी पार्वती के बनाए जीवित बालक की गर्दन काट दी थी। जिसके बाद शिवगणों ने उस बालक के धड़ में एक हाथी का सिर लगा दिया और इससे भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई थी। तब से ही इस दिन को गणेश उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

कैसे मनाते हैं गणेशोत्सव-

गणेशोत्सव के पहले लोग बप्पा की मूर्ति को घर लाते हैं। मूर्ति स्थापना के बाद उत्सव के पहले दिन से लोग श्री गणेश की मूर्ति की सुख-शांति और समृद्धि के लिए आरतियां गाकर विशेष और विधिवत पूजा करते हैं। अगले 10 दिनों तक सुबह-शाम ये पूजा की जाती है।

विशेष पकवानों का त्योहार-

गणेशोत्सव के दौरान विशेष प्रसाद का बड़ा महत्व होता है। भगवान गणेश को लड्डू और मोदक काफ़ी पसंद थे। मोदक एक महाराष्ट्र का पकवान होता है। जो कुछ-कुछ गुझिया से मिलता जुलता है। 10 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में हर दिन मोदक और लड्डू का भोग भगवान गणेश को अवश्य लगाया जाता है।

बाल गंगाधर तिलक ने शुरु की परंपरा-

गणेशोत्सव का पर्व यूं तो मराठा सम्राट शिवाजी के समय से शुरु हो गया था जिसके बाद पेशवा और मराठा सम्राज्य के कई राजघरानों ने इसे अपनाया। सार्वजनिक तौर पर इसे आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजसेवी बाल गंगाधर को जाता है। जिन्होंने पुणे में इस पर्व को लोगों के घरों तक पहुंचाया। सबसे पहले इस त्यौहार की शुरु पुणे से की गई थी।

गणपति विसर्जन-

उत्सव के 11वें दिन भगवान श्री गणेश को विदाई दी जाती है। गणपति की मूर्ति को किसी नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित किया जाता है। विसर्जन के दौरान भव्य जुलूस निकाले जाते हैं। इन जुलूसों में ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते हुए भक्त बप्पा को विदाई देते हैं और अगले साल जल्दी आने की कामना करते हैं।

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