70 Stories of Independent India - Part 3

70 Stories of Independent India - Part 3

आज़ादी के वक्त नेहरू की आँखों से जैसे पूरा हिंदुस्तान विकास का सपना देख रहा था। देश भी और देश का सिनेमा भी दोनों नई सोच के साथ बदलाव की धारा बना रहे थे। 50 के दशक की फिल्में भी नेहरू के समाजवाद से प्रेरित थीं। दुनिया के मंच पर जवाहरलाल नेहरू गुट निरपेक्ष आंदोलन के अगुवा बने मगर देश के भीतर वो सियासी दाँवपेंच से परेशान थे

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दो बीघा ज़मीन से लेकर मदर इंडिया जैसी फिल्में सोशल रिफ़ॉर्म का नया फार्मूला सुझा रही थीं। ऐसी फिल्मों ने आज़ादी के वक्त हिंदुस्तान को एक बेहतर मुल्क बनने की दिशा सामाजिक योगदान दिया।

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नेहरू ने निर्णय लिया कि वो बेटी इंदिरा को राजनीति का हिस्सा नहीं बनने देंगे मगर 1959 के नागपुर अधिवेशन में पार्टी सलाहकारों ने नेहरू को आखिर मना लिया और 1959 को इंदिरा कांग्रेस की अध्यक्ष चुन ली गई।

 

 

 

 

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पडोसी देशों से दोस्ती उनकी कूटनीतिक रणनिति का अहम हिस्सा थीं, लेकिन 1959 में तिब्बत में हुए विद्रोह और दलाई लामा के भाग कर भारत आने के बाद नेहरू के सामने धर्म संकट था। वो 1954 में चीन से समझौता कर मान चुके थे कि तिब्बत चीन का हिस्सा है ऐसे में दलाई लामा को शरण देने पर चीन भड़क गया।

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भारत की उत्तरी पूर्वी सरहद चीन के साथ विवादों की वजह थी। इस विवाद को 1954 में सुलझाने की भारत की कोशिशों को नाकाम करते हुए चीन ने सरहद के पुराने नक्शे के अध्यन का हवाला दिया। ये बात तब भी उठी जब 1960 में चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई भारत दौरे पर आए। मगर अपने मनसूबे का असली रूप दिखाते हुए 1962 में चीनी फौज ने पूरब में नेफा सेक्टर पर हमला कर दिया।

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भारत की उत्तरी पूर्वी सरहद चीन के साथ विवादों की वजह थी। इस विवाद को 1954 में सुलझाने की भारत की कोशिशों को नाकाम करते हुए चीन ने सरहद के पुराने नक्शे के अध्यन का हवाला दिया। ये बात तब भी उठी जब 1960 में चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई भारत दौरे पर आए। मगर अपने मनसूबे का असली रूप दिखाते हुए 1962 में चीनी फौज ने पूरब में नेफा सेक्टर पर हमला कर दिया।

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चीन की सेना हिंदुस्तानी सीमा में 16 किलोमीटर अंदर तक दाखिल होकर नेफा और तवांग को अपने कब्जे में कर चुकी थी।1962 की ये लड़ाई हिंदुस्तानी फौज बिना साधन और संसाधन के सिर्फ अपने हौसलों से लड़ रही थी। टेलिफोन लाईनें बस एक दो पोस्टों तक पहुंचाई गई थी बाकी मैसेज पहुंचाने के लिए जवानों को पैदल जाकर सूचना पहुंचानी पड़ती थी।

 

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चीनी हमले की खबर 8 सितंबर 1962 को ही आ गई थी लेकिन भारत ने ये सोचकर गंभीरता से नहीं लिया कि ये दलाई लामा को भारत में शरण देने की प्रतिक्रिया है। भारत की हार केबाद चीन ने 10 नवंबर को एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी, और फिर दिल के दौरे के बाद हिंदुस्तान के इस प्रधानमंत्री के कई सपने भी उनके साथ ही खत्म हो गए।

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बाहरी खतरे का सामना करते हिंदुस्तान में सियासी बागडोर किसके हाथ में हो ये सवाल भी सामने खडा था। ऐसे में दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जय जवान जय किसान का नारा लेकर आए। ये नारा हरित क्रांति का एलान बना।
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वहीं सन 1965 में पाकिस्तान ने कच्छ के रण और अरब सागर के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया जिसमें पहले तो ब्रिटेन के बीच बचाव के बाद युद्ध विराम हो गया मगर फिर पाकिस्तान के सामने भारत ने भी आक्रामक रूख अपना लिया।

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सितंबर में पाकिस्तान के द्वारा घाटी के छंब सेक्टर में हमला बोलने और भारत के सप्लाई रूट पर कब्जा करने के बाद शास्त्री जी ने भी जवानों को पाकिस्तान की सीमा में घुसने की छूट दे दी। पाकिस्तान को ललकारते हुए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जंग के लिए वक्त और जगह तय करने की इजाजत दे दी।

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सितंबर में पाकिस्तान के द्वारा घाटी के छंब सेक्टर में हमला बोलने और भारत के सप्लाई रूट पर कब्जा करने के बाद शास्त्री जी ने भी जवानों को पाकिस्तान की सीमा में घुसने की छूट दे दी। पाकिस्तान को ललकारते हुए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जंग के लिए वक्त और जगह तय करने की इजाजत दे दी।