70 Stories of Independent India - Part 1

India journey since 1947 after indipendence

जिस आज़ादी का हम जश्न मना रहे हैं, वो सालों के संघर्ष और हज़ारों शहादत के बाद 15 अगस्त 1947 को मिली। जहां एक तरफ 200 सालों से पड़ी गुलामी की बेड़ियों से मिली आजादी की खुशी थी तो वहीं दूसरी तरफ बंटवारे का ग़म भी... बंगाल से पंजाब तक हिंसा की आग में जल रहा था... और इसके बीच आज़ाद हिंन्दुस्तान के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया।

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इंडिया गेट पर 5 लाख भारतीयों के जय-जयकार से आसमान गूंज उठा... बंटवारे और दंगे के दर्द से आहत बापू इस जश्न में शामिल नहीं हुए।

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बापू दंगे की आग में जलते बंगाल को अमन की राह पर लाने की कोशिश में लगे थे। हिंसक भीड़ ने उन पर भी हमला किया जिससे आहत बापू ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।

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बंगाल में जब बापू से कहा गया कि वो रेडियो और अखबारों में आज़ादी का संदेश दें, तो उन्होंने कहा "मैं सूख चुका हूँ, संदेश जाकर नेहरु से ले लो"

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पंजाब का मंजर देख नेहरु कांप उठे...पूरी रात लाहौर के गेस्ट हाउस में टहलते रहे, चिंतित नेहरु सो नहीं पाए। उन्हें कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

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अगली सुबह नेहरु को पता चला की अमृतसर के गांव में सिख और मुसलमान आपस में भिड़ने वाले हैं... नेहरु ने उन्हें समझाया। नहीं मानने पर दंगा करने वालों को गोली मारने की भी चेतावनी दी।

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जिस आज़ाद भारत का सपना नेहरु ने कभी देखा था, वो ऐसा नहीं था अब सारे रास्ते नेहरु को बंद नज़र आ रहे थे।

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मोहम्मद अली जिन्ना ने शर्त रखी कि आज़ाद भारत में केन्द्र की बजाय राज्य सरकारों को ज्यादा अधिकार दिया जाए, नेहरु का मानना था कि इससे संघीय ढांचा कमजोर होगा।

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आज़ादी के बाद 565 रियासतों को एक करना मुश्किल काम था... कुछ रियासतें हिन्दुस्तान के खिलाफ बग़ावत कर रही थीं... गृह मंत्री बल्लभ भाई पटेल ने सबको बात करने के लिए मनाया।

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जहां राजा-महाराजों ने अपने राज्यों में राजशाही के सपने देखे तो वहीं आजाद भारत लोकतंत्र चाहता था। बग़ावत की आग में पाकिस्तान ने चिंगारी डाली